लद्दाख के यात्रा वर्णन की शुरुआत में पोते रिआन की तरफ़ से एक पहेली:
रिआन की तरफ़ से एक पहेली :
चिटोस नामक स्नैक के एक ही पाउच के दो चित्र है,
उनमे से एक पिचका हुआ है
और दूसरा फूल कर कुप्पा हो गया है,
पाउच पूरा सील बंद है,
ऐसा क्यो?
When taken from a place with higher atmospheric pressure (Indore, first photo) to a place with lower atmospheric pressure ( Leh, the second photo), the air in the pouch as a whole gets expanded.
हम जहाँ जहाँ गए उन स्थलों की समुद्र सतह से ऊँचाई:
Srinagar: 1,585 meters (5,200 feet)
Sonmarg: 2,740 meters (8,990 feet)
Kargil: 2,676 meters (8,780 feet)
Lamayuru: 3,370 meters (11,060 feet)
Leh: 3,500 meters (11,500 feet)
Pangong Lake: 4,250 meters (13,940 feet)
Nubra Valley: 3,150 meters (10,335 feet)
Turtuk Village: ~9,800 feet (2,991 meters),
खर्दुंगला दर्रा:17500 feet.
Jozila दर्रा 16500 feet
Sanglaa pass:17000 feet
Our itinerary was as follows:
2 june : Departure from Indore- Delhi- Shrinagar. Then by taxi to Sonmarg
3 june : Long Road trip from Sonmarg to Lamayaru. On the way- Drass, Drass river, Kargil War Museum.
4 June - Lamayaru to Leh. Two nights at Leh.
6 june : The border town in Nubra valley Turtuk Homestay Mr Ismail
7 and 8 june : Nubra valley, Sand Dunes, Hot springs, Bactrian Camel Ride.
9 june : Pangong Lake.
10 june Again Leh (on banks of Indus )
11 June: Return flight to Indore via Delhi
लद्दाख यात्रा के पहले थोड़ा सा भूगोल
भूगोल मेरा प्रिय विषय है। एटलस को देखते रहना मेरा प्रिय शगल है। आम तौर पर भारतीय पर्यटक भूगोल, इतिहास, संस्कृति आदि के बारे में पहले से पढ़ कर नहीं जाते।
यदि ऐसी तैयारी से जायें तो किसी स्थान को घूमने का आनन्द कई गुना बढ़ जाता है।
सभी जानते हैं कि हिमालय और सम्बन्धित पर्वतमालाएं तुलनात्मक रूप से नई हैं। महज पांच करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट तैरते तैरते एशियन प्लेट से टकराई थी। हिमालय का उठना शुरू हुआ।
एक के पीछे एक समानान्तर पर्वतमालाएं बनीं। गंगा जमुनी दोआब से उत्तर में बढ़ें तो इस क्रम से पहाड़ मिलते हैं।
1. शिवालिक (मसूरी)
2. Lesser Himalaya (हिमाचल) – शिमला, मनाली
3. Greater Himalaya (हिमाद्रि)
हिमाद्रि के उत्तर में जाने को दो प्रमुख दर्रे हैं — श्रीनगर-सोनमर्ग के आगे जोजीला और मनाली के ऊपर रोहतांग।
4. थेसीयन हिमालय — इसमें लद्दाख व जास्कर पर्वतमाला आती है।
5. ट्रांसहिमालयन पर्वत इसमें काराकोरम, कुनलुन और तिब्बत का पठार आते हैं।
कृपया संलग्न नक्शों पर गौर करें।
👆हमारे द्वारा विजिट किए गए स्थान
हमारी पारिवारिक यात्रा का खास महत्व
निपुण ने पूरी प्लानिंग करी। टिकिट, होटल टेक्सी सब कुछ।
निपुण, मैंने और ऋतु ने तो थोड़ी थोड़ी बेकग्राऊण्ड रीडिंग करी।
9 दिन की इस यात्रा में हमने महसूस किया कि ऐसा सघन घनिष्ट साथ हम दैनंदिन जीवन में कब पाते है?
सब काम पर लग जाते हैं। बच्चे स्कूल तथा होमवर्क में व्यस्त रहते है।
मुझे यह भी लगा कि इस देशाटन के बहाने माता पिता और दादा-दादी द्वारा हम बच्चों को कुछ ज्ञान, संस्कार और सोच-विचार भी दे पाये। एक मायने में यह एक शैक्षणिक टूर भी था। ढेर सारे किस्से कहानियां, सन्दर्भ, पहेलियां, चुटकले आदि चलते रहे। निर्झरी (14) और रियान (9) की यह उम्र Formative Years की है।
जिन्दगी की नींव के पत्थर रखे जा रहे है। ऊपरी दो पीढ़ियों के लिये यह एक आनन्ददायी जिम्मेदारी है।
निपुण की प्लेलिस्ट में से गाने सुनना मनोरंजक था,
उन्ही गीतों पर आधारित
क्विज चलती रहीं, कौन गायक, कौनसी फ़िल्म, कौन अभिनेता अभिनेत्री,?
जाहिर है इस खेल में मैं फिसड्डी रहा होऊंगा
उपरोक्त चित्रों के कैप्शन:
१. लेह में सिंधु नदी के किनारे हमारी होटल के द्वार पर
२. खर्दूँगला दर्रे पर
३. लेह महल की सबसे ऊँची छत से नगर का विहंगम दृश्य
४. नुब्रा घाटी के अंतिम सीमावर्ती गांव तुर्तुक में बहता झरना और नदी जो श्योक नदी में मिलती है
भारतीय और एशियाई प्लेट के टकराने से उभरी पर्वतमालाएँ जिनमें से हिमालय एक है
एक एडवेंचर सत्तर के आस पास ,
पहली बार Zip line पर लटक गए और नदी के इस पार से उस पार,
दो नदियों का संगम स्थल ,
Indus ( सिंधु) और जांसकर,
चौड़ा पाट
खूबसूरत नज़ारा
संगम के दो किनारों पर दो टावर।
उनके बीच बाँधा हुआ लंबा तार
हमे कस कर बांधा गया और हौले से धकेल दिया गया
लद्दाख में भोजन
शाकाहारी होने की सीमा के कारण मेरे स्वाद के दायरे आरम्भ से संकुचित रहे हैं।
फिर भी मेरी कोशिश रहती है नये नये देश प्रदेशों में वहां की स्थानीय डिश और डेलीकेसी को चखूं, स्वाद विकसित करूं, उन्हें समझूं सराहूं।
लद्दाख में अधिक प्रयोग नही कर पाया। फिर भी कैप्शन सहित कुछ चित्र सलंग्न है।
मुझे मेनु कार्ड में विभिन्न रेसीपी का वर्णन पढ़ने में मजा आता है।
कभी मौका मिले तो अन्दर से शेफ को बुलवाने का अनुरोध करता हूँ, उनसे बातें करता हूँ।
मेरा मन होता है कि Food Blogger or Gourmet Tourist के रूप में कुछ कुछ लिखूं।
हिन्दुस्तान टाइम्स में वरिष्ठ राजनैतिक समीक्षक पत्रकार श्री वीर संघवी बहुत रोचक फ़ूड Blog लिखते है।
हिन्दी में ऐसा लिखने वाले शायद बहुत कम होंगे। हालांकि यह भी लेखन का एक महत्वपूर्ण Genre (विधा है)।
मुश्किल यह है कि अधिकांश भारतीय लोगों की स्वाद की दुनिया बहुत छोटी होती है। उन्हें हम Xenophobic कह सकते है।
( अनजान या विदेशी के प्रति भय या विकर्षण)
हिन्दुस्तानियों की यात्रा भर में एक ही ख्वाहिश रहती है:
“ बस घर जैसा खाना मिल जाये”।
नये नये स्वादों और रेसिपी के साथ प्रयोग करना उन्हें नहीं आता।
उपरोक्त मेनू कार्ड में से कुछ entries
1.( soup with mutton dumplings )
MUTTON RU-CHOWTSE……………………………………... Rs 280
(soup with muttons dumplings and glass noodles)
2. VEG THUKPA………………………………………………….. Rs 230
(garlic flavoured veg broth with noodles, mild spicy)
3. CHICKEN THUKPA……………………………………………. 280
(garlic flavoured chicken broth with noodles, mild spicy)
4. MUTTON THUKPA……………………………………………... 310
(garlic flavoured mutton broth with noodles, mild spicy)
5. VEG THENTHUK………………………………………………… 240
(garlic flavoured veg broth with thin sliced dough, mild spicy)
6. CHICKEN THENTHUK………………………………………….. 280
(garlic flavoured chicken broth with thin sliced dough, mild spicy)
7. MUTTON THENTHUK…………………………………………... 310
(garlic flavoured mutton broth with noodles, mild spicy)
स्पेशल गोलाकार लपेटी हुई रोटी और साग
बकव्हीट is commonly known as Kuttu (कट्टू) in Hindi. It is also referred to as Kuttu ka Atta when used as flour. This gluten-free grain is a popular choice for fasting meals, particularly during festivals like Navratri.
Buckwheat is not a true cereal grain, but its seeds are used in similar ways, making it a pseudocereal. It is also known for its high nutritional value and is often used to make rotis, puris, and other dishes.
BALTI SPECIAL
1. KISSIR NA TSAMIK*_
BUCKWHEAT FLAT BREAD WITH LOCALLY HERBED CURD
2. MOS KOT*_
WALNUT PUREE WITH
CRUMBLED BUCKWHEAT BREAD AND ONION
3. TSA PON*_
THICK FLATBREAD
CRUMBLED WITH ONION,
TOMATO AND BUTTER
BRINGYA*_
4. CHU TSOS BUS P TSONMA*_
POTATO, TOMATO, CARROT, PEAS
CHAPOAY FEY &
APRICOT SEEDS & WALNUTS
भाषा
लद्दाखी भाषा भारो-पीय [Indo-aryan] परिवार की नहीं है। उसकी फेमिली है तिब्बतो-बर्मन। 2011 की जनगणना के अनुसार 1,11,000 लोग इसे बोलते हैं।
यह अनुभव कर के कि देश के सुदूर प्रान्तों में, देहातों में, पहाड़ों में, जंगलों में आम लोगों से हिन्दी में आसानी से बात होती है, मन प्रसन्न होता है। मेट्रोपोलिटन शहरों के अभिजात्य (Elite) वर्ग और अंग्रेजी अखबारों पर मुझे गुस्सा आता है जब वे “राष्ट्रभाषा” और “National Language” जैसे विशेषण की हंसी उड़ाते हैं, व्यंग करते हैं।
लद्दाखी लोगों की अपनी खास भाषा है। उनकी लिपि तिब्बती या भोटी है। उन्हें हिन्दी पढ़ने में दिक्कत आती है। स्कूलों में हिन्दी/उर्दू, भोटी/तिब्बती, लद्दाखी और अंग्रेजी पढ़ाई जाती है। सीमावर्ती बाल्टी गांवों में अरेबिक की आरम्भिक शिक्षा भी दी जाती है।
1971 में बाल्टीस्तान से जीते गये गांवों के लोग वाचिक परम्परा के रूप में बाल्टी भाषा में बात करते हैं। मैंने एक सज्जन से मेरे तीन वाक्यों को बाल्टी में बोलने को कहा तो उसका वीडियो इस लिंक पर है। हालांकि उसके उच्चारण को मैंने देवनागरी में लिखने की कोशिश की है।
तिब्बती लिपि के कुछ उदाहरण:
* MAITREYA (SKRT.) བྱམས་པ BYAMS PA
* ༄༅།།ཨོཾ་མཻ་ཏྲི་མཻ་ཏྲི་སྭཱ་ཧཱ།། Om Maitri Maitri Swaha
* ཞི་བའི་མཆོད་རྟེན། SHANTI STUPA
* པཱ་ན་མིག་གི་ཆུ་ཚན། HOT SPRING PANAMIK
* དིས་སྐྱིད་དགོན་པ། DISKIT MONASTERY
* གཟིམ་ཆུང་རྙིང་པ། Old Chamber of His Holiness The 14th Dalai Lama
* ཐུབ་དབང་ལྷ་ཁང༌། Temple of Buddha Shakya Muni
HeGan Mulbekh Chamba Lha-KHANG
कारगिल लेह हाईवे पर कारगिल से 40KM दूर, मूलबेख मोनास्टरी या गोम्पा (समुद्र सतह से 11,495 फीट) की ऊँचाई पर।
तिब्बतीय बुद्धिज्म की ड्रुपका और गेलुग शाखा के अन्दर दो गोम्पा है।
सड़क किनारे, कुछ कि.मी. दूर से ही एक 200 मीटर ऊंची नुकीली चट्टान [Crag] दिखाई पड़ने लगती है।
पास आते आते उस चट्टान के टॉप पर तीन मानव आकृतियां नजर आती है। लामाओं की मूर्तियां है। उन पर ढीले ढीले रंगबिरंगी वस्त्र तेज हवाओं में फड़फड़ाते हैं।
क्रेग को हिन्दी में श्रंग (सींग) या ग्रीवा (गर्दन) भी कहते है क्योंकि यह दूर से कुछ कुछ वैसी ही दिखती है।
यह मंदिर 800 वर्ष पुराना है।
यहां पर चट्टान काट कर भगवान बुद्ध की मूर्ति का Facade (बाह्य स्वरूप या Releaf) बनाया गया है।
लद्दाख में केवल तीन ऐसे Rock-cut बुद्ध है और इन्हें लद्दाख के ‘बामियान बुद्ध’ कहा जाता है। मैत्रेयी बुद्ध की यह मूर्ति 30 फीट ऊंची है। इसे ‘चम्बा’ भी कहते है। मूर्ति और अधिक पुरानी है। शायद कुषाण युग की। (प्रथम शताब्दी BCE से छटी शताब्दी CE के मध्य की)।
समीपस्थ चट्टानों पर खरोष्ठी लिपि में कुछ शिलालेख अंकित हैं।
(नुब्रा घाटी में )
यूं तो गरम पानी के सोते और कुण्ड दुनिया भर में मिलते है। अधिकांश पर्यटकों ने इन्हें अनुभव किया होता है।
किन्हीं किन्हीं भूगर्भीय कारणों से धरती की गहराई में स्थित लावा वाली परत की गरमी इन सोतों और फव्वारों (Geyser) के रूप में निकलती है।
प्राय: इस पानी में सल्फर तथा कुछ अन्य तत्वों की मात्रा अधिक होती है। मान्यताएं व्याप्त हैं कि इनके स्वास्थ्य लाभ है। विशेषकर चर्म रोगों और गठिया रोगो में।
मुझे नहीं मालूम कि किसी ने कभी इन दावों पर वैज्ञानिक प्रमाण की दृष्टि से शोध करी है या नहीं।
हम इसके पहले शान्तिनिकेतन के रास्ते में, मनाली के वसिष्ठ आश्रम में और चेक रिपब्लिक में इनमें स्नान कर चुके है।
10,000 फीट की ऊंचाई पर बर्फ से ढंकी चोटियों के दर्शन करते हुए लद्दाख की नुब्रा घाटी के पामानिक गांव में हाट स्प्रिंग में डुबकी लगाने का अनुभव अलहदा था।
यह इलाका सियाचिन ग्लेशियर के बेस कैम्प के रास्ते में पड़ता है,
सियाचिन नाम से ही रोमांच हो आता है,
गांव का पुराना नाम था — स्पांग ना-चुमिक। ‘स्पांग’ अर्थात् Medow या घास का मैदान। चुमिक अर्थात् वसन्त या बहार।
समीपस्थ शासकीय अस्पताल व अन्य संस्थानों को पाइप लाइन द्वारा सतत गरम पानी मिलता रहता है।
शुरु शुरू में पांव डुबोते ही लगता है कि इतना गरम सहन नहीं कर पायेंगे। धीरे धीरे त्वचा की ताप-संवेदी नर्व Adapt होती हैं, अपनी फायरिंग कम करती हैं। ब्रेन के हायर सेन्टर भी मन को समझाते है एक एक पेढ़ी उतरते उतरते पूरी डुबकी लगा कर मन प्रफुल्ल हो जाता है।
शरीर में उष्मा भर गई है,
बाहर तन को फहराती हुई ठण्डी हवा स्पर्श कर रही हैं।
मैं अचरच कर रहा हूँ कि कैसे इस कुण्ड की उथली पेंदी में लाल रंग की काई (Algae) इस तप्त जल की इकालाजी में विकसित हुई होगी।
लद्दाख में भारतीय सेना
Ubiquitous है। चप्पे चप्पे पर मिली।
गर्व होता है हमारे जवानों और अफसरों से मिलकर, बात करके। पूर्ण अनुशासित। हर तरह से फिट। सौम्य मुस्कान के साथ बातचीत। आत्मविश्वास से लबरेज।
ड्रास के कुछ आगे “कारगिल वार म्यूजियम” देख कर अभिभूत हो गये।
कोई स्मारक संग्रहालय कैसा होना चाहिये यह इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
पूरे युद्ध की पृष्ठभूमि, टाइम लाइन, शहीद वीरों की कहानियां, उनके मूर्तिशिल्प, ऊंची पर्वतमालाओं और भारतीय जावांजों के युद्ध कौशल के माडल, अमर जवान ज्योति, कुल 550 के लगभग दिवंगत शहीदों के नामों का ससम्मान उल्लेख।
सैनिकों द्वारा अपने परिजनो को लिखे अन्तिम पत्रों को पढ़ते पढ़ते हमारी आंखे नम हो आईं।
हिन्द और हिन्द की सेना के प्रति सम्पूर्ण श्रद्धा से सराबोर हो कर हम बाहर निकले। कौन जाने मेरे कुछ वामी मित्र इसे Jingoism कहें।
सीमावर्ती गाँव तुर्तुक में भारतीय सेना का मानवीय पक्ष
1971 के भारत पाक युद्ध के बाद नुब्रा घाटी के चार गांवों के मुस्लिम नागरिक, यकायक, एक ही दिन में भारतीय नागरिक बन गये।
सेना ने उन्हें सहारा दिया, ढाढस बंधाया, आत्मविश्वास दिलाया, आजीविकाएं दी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं दी। स्थानिय उनसे खूब बातें हुई। उनके किस्से सुने।
हमारी होटल के मालिक इब्राहिम के शब्दों में
“आर्मी और हम एक परिवार की तरह हैं
“हिन्दुस्थान की फौज आम आदमी का ध्यान रखती है।
“PoK में रहने वाले रिश्तेदार बताते है कि वहां के हालात खराब है, आर्मी सिर्फ खुद पर और V.I.P. पर खर्चा करती है।
“एक बार श्रीनगर के पांच कश्मीरी मेरे यहां ठहरे थे। बैठे बैठे पॉलिस्टिक्स बहस में गर्मी और जोश आगया। वे सब Brainwashed थे। मैं अकेला उनसे जूझता रहा। गुस्से में मैने उन्हें रात के 2 बजे होटल से बाहर निकाल दिया। कश्मीरी तो कुत्ते की दुम है — कभी सीधी नहीं होगी। आतंकवादियों को वे ही पनाह देते हैं।
“देखों सभी गाँव में जगह जगह बंकर बने है। 1999 में कारगिल युद्ध के समय सामने वाली ऊंची पहाड़ियों पर से पाकिस्तानी सेना ने हम पर गोलाबारी करी थी।
भारतीय सेना ने अनेक परिवारों को बंकर बनवाने के लिये चालीस हजार रुपये की मदद करी थी।
हमारी ड्रायवर अली मोहम्मद सागर भी बालटी नस्ल का है हुसैन का सहपाठी रहा है और उसने भी इन्ही बातों की ताकीद करी।
“मेरे मामू उधर है। वहां शक्कर और आटे का भाव हिन्दुस्थान से पांच गुना ज्यादा है। गरीबों की हालत बुरी है।
“मेरे ज्यादातर दोस्तों और रिश्तेदारों को इन्डिया की आर्मी में नौकरी मिली हुई है।
[12:19 pm, 19/6/2025] +91 99266 34520: नुब्रा युद्ध
भारत विभाजन के समय नुब्रा घाटी पाकिस्तान से सीमा बनाती थी।
1948 के प्रथम भारत पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना 30-40 कि.मी. अन्दर घुस आई।
स्थानीय सुरक्षा समितियां असहाय थी। सिर्फ 30 सिपाहियों की एक रेजीमेन्ट को पीछे हटना पड़ा। सुरक्षा समिति के प्रमुख ने लेह में हाई स्कूल में पढ़ रहे पुत्र त्वेसांग रिंचेन को भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से मिल कर अतिरिक्त बल और शस्त्र भिजवाने को कहा। एक गुरखा रेजीमेन्ट भेजी गई लेकिन भाषाएं न जानने के संवाद मुश्किल था। बड़ी मुश्किल से एक दुभाषिया मिला।
1952 में त्वेसांग रिचेन के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तानियों को मूल विभाजन रेखा तक पीछे खदेड़ दिया। त्वेसान रिचेन को मेजर का पद और महावीर चक्र मिला।
1962 के भारत चीन युद्ध में नुब्रा मिलिशिया के जाबांजों ने खूब बहादुरी दिखाई। अब उन्हें औपचारिक रूप से भा…
भारतीय सेना के साथ उपखण्ड
Border Road organization (B.R.O.)
उत्तरी भारत के पहाड़ी सीमावर्ती क्षेत्रों के सड़क यात्रा करते हुए पिछले तीन दशकों से हम B.R.O. [Border Road Organization] के काम से परिचित रहे हैं। यह संगठन भारतीय सेना से सम्बद्ध है।
लद्दाख की इस यात्रा से जाना कि पिछले दस वर्षों में BRO के बजट और काम में कितनी वृद्धि हुई है। चप्पे पर BRO के चिन्ह insert image स्लोगन, हिदायते दिखते हैं स्वागत करते हैं, हौसला बढ़ाते हैं। सचेत करते हैं।
सीमा के अन्तिम छोर तक उच्च क्वालिटी की डामर की, सिंगल लेन या डबल लेन सड़के मिलती है। हर कुछ किलोमीटर पर दर्जनों हेलमेट धारी श्रमिक ठेकेदार ओवरसियर मिलते है। कड़ी धूप या ठिठुरती ठण्ड में अनवरत कार्यरत। इमर्जेन्सी में नागरिकों की सहायता के लिये सदैव तत्पर।
अत्यधिक ऊंचाई वाले दुर्गम स्थलों पर इनके केम्प एक आसरा होते है। JCB और बर्फ काटने वाली मशीनों से इनके दल सुसज्जित होते है।
टीन शेड या अन्य मेटल के बने Pre-fabricated मकानों के संकुल हमने थोड़ा रुक कर पास से देखे।
पूर्ववर्ती सरकारों के लिये यह विभाग तुलनात्मक रूप से उपेक्षित था। एक पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा था — यदि हम अच्छी सड़कें बना देंगे तो हमलावर दुश्मन की फौज अधिक आसानी से हमारे देश के अन्दर घुसती चली आयेगी।
BRO के कारण स्थानीय रोजगार और इकानामी को बहुत मदद मिली है।
पर्यावरणविदों की चिन्ताएं अपनी जगह जायज है लेकिन सुरक्षा और अर्थशास्त्र भी महत्वपूर्ण है।
किसी भी स्थानीय नागरिक ने इस “विकास” की आलोचना नही करी। व्यापार, शिक्षा, स्वास्थय सभी में सुधार हुआ है।
झण्डियां (ध्वजाएं)
झण्डियां (ध्वजाएं) सभी बौद्ध मठों, स्तूपों तथा सड़क, बाजार, गांव, सुनसान रास्तों, में रंगबिरंगी झण्डियां लद्दाख तथा अन्य बौद्ध क्षेत्रों की पहचान है। लगभग हर जगह मिलती है। क्षेत्र-प्रान्त को खास पहचान देती है। सुन्दर लगती है। शुभ-शुभ लगती है।
इनकी भाषा और लिपि (तिब्बती /भोटी) पढ़ी नहीं जाती, समझी नहीं जाती।
अनेक मंत्र होते हैं। सबसे प्रसिद्ध है “ॐ मणि पद्मे हुम”।
(छ: अक्षर का मंत्र है) “कमल में स्थापित मणि को प्रणाम”
‘ओम्’ = उदारता।
‘मणि’ = रत्न (करुणा का प्रतीक)
‘पद्मे’ = कमल (ज्ञान का प्रतीक)
‘हुं’ = घोषणात्मक आकांक्षा की ध्वनि।
वर्ष 1994 में मंगोलिया यात्रा में एक बौद्ध मठ के प्रवेश द्वार पर देवनागरी लिपि में लिखे इस मंत्र को जब मैने सस्स्वर उच्चारित किया था तो मेरे मंगोलियाई मेजबान मित्र आश्चर्य चकित और गदगद हो गये थे।
इसके अलावा और भी मंत्र इन ध्वजाओं पर Block printing (लकड़ी की मुहर) विधि से अंकित रहते हैं।
पांच रंग की झण्डियां होती है। पंच-महाभूत।
नीला - आकाश, अंतरिक्ष
सफेद - वायु
लाल - अग्नि
हरा - जल
पीला - भूमि
ऐसी मान्यता है कि इन ध्वजाओं को फहरा फहरा कर गुजरने वाली हवाएं, इन मंत्रों के आशीर्वाद समस्त जगत और प्राणियों तक पहुंचाती है।
लद्दाखी भाषा में इन ध्वजाओं को लुंग-ता अर्थात् “पवित्र-अश्व” कहा जाता है। इनका इतिहास बौद्ध धर्म से भी पहले की शमन या पेगान परम्परा (बान धर्म) से चला आ रहा है।
दर्रा दर्रा हिमालय
यह उपशीर्षक मैनें मित्र न्यूरोलाजिस्ट अजय सोडानी की इसी नाम की पुस्तक से लिया है।
लद्दाख भ्रमण में हमने तीन प्रमुख Mountain Pass (दर्रे) पार करे।
एक घाटी से दूसरी घाटी। के बीच खड़ी पर्वत श्रृंखला को पार करने के लिये ऐसा मार्ग चुना जाता है जो तुलनात्मक रूप से कम ऊंचाई पर हो।
1. जोज़ीला पास [16,000 फीट]
श्रीनगर - सोनमर्ग से आगे लद्दाख में प्रवेश करते समय।
2. खारदुंगला दर्रा
लेह से नुब्रा घाटी जाते समय [17,500 फीट]
3. चांगला पास
पेंगांग झील से लेह वापिस लौटते समय [17,000 फीट]
यहां की हवा में आक्सीजन सबसे कम होती है। तापमान प्राय: शून्य डिग्री या नीचे। चारों और ऊंचे ऊंचे बर्फ से ढके पहाड़। तीखी बेधती हवाएं।
बार्डर रोड आर्गनाइजेशन की केम्प, साइन बोर्ड, कुछ रेस्टोरेण्ट, अनेक फोटो-स्पॉट। सड़क के किनारे जमी हुई अनेक फ़ीट मोटी बरफ में खेलने का आनन्द।
परी व रियान के साथ उत्साह उत्साह में बर्फ की गेंदें मारने के खेल में यकायक सांस उखड़ने लगी। झट गाड़ी में बैठ कर आराम करना पड़ा।
प्रार्थनाओं से अंकित रंगबिरंगी झण्डियां माहौल को सुन्दर और पवित्र बनाती है। आगे का सफर ढलान का, उतराई का होता है।
*हुन्डर गांव के पास रेत के ढूह
(Sand Dunes)*
राजस्थान के थार मरुस्थल से छोटे लेकिन कलात्मक सुन्दरता में आगे। उनकी डिजाइनें मन मोहक।
यह एक छोटा सा नया रेगिस्तान है। शुरू में यहां लद्दाख की खास पहचान कंटीली झाड़ियों [Seabuckthorn] का जंगल हुआ करता था।
1927 में खुमदन नाम की एक झील के बन्द फूट पड़े। पूरी घाटी जल प्लावित हो गई। पानी जब उतरा तो साथ आई ढेर सारी रेता रह गयी जो समय के साथ हवा के थपेड़े खा खा कर Dunes (ठूहों) के नयनाभिराम रूप धारण करती गई।
यह एक ठण्डा रेगिस्तान है।
एक और कोल्ड डेजर्ट मैंने देखा था मंगोलिया में ‘गोबी रेगिस्तान’ नाम से। वहां रेत कम और घास के मैदान (Meadows) अधिक थे।
अपना थार, साऊदी अरब और उत्तरी अफ्रीका में सहारा मरुस्थल सब गरम प्रदेश हैं।
The gentle beauty of small Sand Dunes in the background of a lush green belt followed by a gushing wide stream of mighty Shyok River, further flanked by majestic mountains, creats a unparalleled landscape.
बस निहारते ही रहो,
नयन सुख लेते रहो,
Does reading and knowing a bit about the place makes one a lesser रसिक?
Does it reduce your sense of joy?
Not for me at least.
On the contrary, it is enhanced.
*Flora and Fauna of Ladakh -
Only those species seen by us*
*लद्दाख की वनस्पति और प्राणी जगत -
केवल वे प्रजातियां जो हमें दिख पड़ी*
प्राणी जगत
लद्दाख में लेमायरू और लेह पहुंचते ही सबसे पहला ध्यान इस बात पर जाता है कि हमारे मैदानी इलाकों में पाये जाने वाले आम पालतू पशु जैसे कि कुत्ता, बिल्ली, गाय, गधा, ऊंट यहाँ अधिक झबरीले, बालदार और रोयेंदार होते हैं।
ठण्डे वातावरण में डार्विनियन सिद्धान्त के अनुसार संयोग वश वाले होने वाले उपयोगी म्यूटेंशन्स की संततियां आगे बढ़ पाई होंगी जिन्हें ऐसी त्वचा मिली।
*यूरेशियन मरमोट
(Eurasian Marmot)*
रोडेन्ट जाति का प्राणी। जैसे कि चूहा, गिलहरी आदि। ये शाकाहारी होते हैं।
दो भाई या मित्र खूब देर तक अठखेलियां कर रहे थे। या गलबहियां, या धक्का मुक्की या नूरा कुश्ती।
खेल रहे थे या लड़ रहे थे या
नर मादा के मध्य शायद Foreplay था।
वीडियो रोकने का मन नहीं होता था।
रोकते तो फिर मस्ती चालू, फिर वीडियो।
देखते-देखते मन ही नहीं भर रहा था।
शीतकाल में खूब गहरा बिल बना कर लम्बी नींद पर चले जाते हैं।
[Hibernation]
प्राचीन यूनानी लेखकों [उदाहरण हेरोडोटस] के लिये इन्हें सोना खोदने वाली चींटी के रूप में जाना जाता था।
इनके बिलों की गाद में शायद कभी-कभी सोने की डलियाँ पाई गई थीं।
हालांकि यह शायद सच नहीं है। इसी वजह से अजय सोडाणी ने अपनी यात्रा पुस्तक
‘एक या जाँस्कर’ के उपशीर्षक के रूप में लिखा है
“सुवरण - खुदैया चिऊँटो का देस”।
दो कूबड़ वाले (Bactrian) ऊंट
यहां पर बच्चों ने पहली बार दो कूबड़ वाले [Bactrian Camel] पर सवारी करी। बहुत सुन्दर और प्यारे दिखते हैं।
मंगोलिया, चीन और मध्य एशिया में ठण्डे इलाकों में पाये जाते हैं। हमारे गरम रेगिस्तान के एकल - कूबड़ (Single Hump) की तुलना में अधिक जीवट वाले, भार ढोने वाले, ठण्ड सहन करने वाले होते हैं।
असल में दो कूबड़ में दुगना भोजन पानी स्टोर करके रखते हैं।
ये ऊँट आयातित है। पुराने ज़माने में यारकन्द, सिक्यांग (वर्तमान चीन) के व्यापारी सिल्क रूट से इन पर बैठकर आते थे। उन्हीं में कुछ छूट गये।
अब संख्या बढ़कर 200 हो गई।
याक
लद्दाख में पशुओं का राजा है ‘याक’।
विशालकाय, (1000 किलो वजन), 6 फीट ऊंचाई, काला और सफेद रंग। अधिकांश पालतू बनाये जा चुके हैं। मुश्किल से 100-150 जंगली बचे हैं। कम हो रहे हैं।
याक को देखने में शान है, गरिमा है, राजत्व है। नर याक एक साँड़ है। याक और गाय की सोहबत से दो तरह की सन्तानें पैदा होती हैं।
(1) जो [DZO] जो नपुंसक होती है।
(2) जोमू (Dzomoo) जो दुधारू होती हैं। काले ठुस्स याक की तुलना में जोमू छोटी होती है तथा उसके मुंह व खुरों के समीप सफेद धब्बे होते हैं।
एक जमी हुई झील के शुभ्र सफेद फर्श पर शाही भंगिमा वाले याक को देख कर बहुत खुश हुए। गठीला बदन। सधी हुई चाल।
पाँवों के खुर अन्दर से पोले ताकि बर्फ में न धंसे। और लो अब उसने बर्फीली झील पर दौड़ना शुरु कर दिया।
वाह क्या दृश्य था। हम निहाल हो गये।
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लेह शहर
लेह, लद्दाख का एकमात्र बड़ा और आधुनिक शहर है। सुन्दर और समर्द्ध। बड़े बाजार। टूर आपरेटर्स के सैकड़ों ऑफिस। बीसियों रेस्टोरेंट और होटल। संकरी गलियां। केन्द्र में पैदल-पथ-मार्केट। महल, मोनेस्ट्री, बगीचे, संग्रहालय, ऑफिसेस, दफ्तर, भले लोग।
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सिन्धु घाट
सिन्धु नदी या Indus River भारत देश की खास पहचान रही है। इसी से हिन्दु, हिन्दुस्थान, India आदि शब्द नामों की व्युत्पत्ति हुई। चीन में हमारा पुराना नाम तिआनझु है अर्थात् स्वर्ण का स्थान। आधुनिक चीन में यिन्दु (Yindu) प्रचलित है जो Indus से सम्बन्धित प्रतीत होता है।
यह गर्व और खुशी की बात है कि पिछले 20-25 वर्षों में भारत सरकार ने देश के जन मानस की चेतना में सिन्धु नदी के गौरव और इतिहास को जाग्रत करने के लिये लेह शहर के बाहर एक सिन्धु घाट विकसित किया है। जून माह में प्रतिवर्ष बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
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लद्दाख में सिख धर्म
यूं तो लद्दाख में गिने चुने सिख ही होंगे। लेकिन दो गुरुद्वारों का उल्लेख करना है।
गुरुद्वारा पत्थर साहब लेमायुरू से लेह आते समय के 25 कि.मी. पहले पड़ता है। किंवदन्ती है कि सोलहवीं शताब्दी में गुरु नानक देव तिब्बत गये थे। वहां उन्हें सम्मान से लामा नानक कहते थे। लौटते समय लद्दाख के एक घाटी में दैत्य का आतंक था। नानक जी वहां समाधि लगाकर बैठे। दैत्य ने पहाड़ से बड़ा पत्थर लुढ़काया जो गुरु जी को छू कर मोम जैसा नरम हो गया। बौद्ध, सिख, हिन्दु सभी यहां मत्था टेकने आते हैं। हमें भी शान्ति और संतृप्ति मिली। यहां के लंगर में छक कर प्रसाद ग्रहण किया।
गुरुद्वारा की समस्त मेनेजमेंट, कार सेवा, तन, मन, धन से भारतीय सेना की अनेक यूनिट्स और आफीसर्स द्वारा करी जाती है।
गुरुद्वारा दातुन साहिब नानक देव जी लेह में जहां ठहरे थे वह जगह जामा मस्जिद के पास है। रात्रि विश्राम के बाद गुरु जी ने सुबह वृक्ष की एक टहनी से दातुन किया और उस टहनी को जमीन में गाड़ दिया। जो कालान्तर में एक बड़ा Miswak वृक्ष बन गया।
यहाँ गुरुद्वारा तो नहीं है, एक निशान साहिब है। नानक जी बाद लेह में हरियाली पनपी।
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Magnetic Hill in Ladakh
लेह के पहले, एक ढलान भरी सड़क कुछ ऐसी आती है कि आसपास का परिदृश्य Visual Illusion (दृष्टि भ्रम) पैदा करता है।
हमारे ड्रायवर ने गाड़ी को न्यूट्रल गियर में डाला। ब्रेक पर से पाँव हटा लिया। गाड़ी तो लुढ़क तो नीचे रही थी लेकिन हमें लग रहा था कि पीछे उपर की दिशा में चढ़ रही है।
किस्सा फैल गया कि यहाँ की धरती के भीतर की चट्टानों में चुम्बक वाला लोहा है जो गाड़ियों को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध खींचता है।
ऐसा है कुछ नहीं, लेकिन गालिब दिल बहलाने ख्याल अच्छा है।
नुब्रा घाटी और श्योक नदी + तुर्तक गाँव
नुब्रा घाटी में बहने वाली नुब्रा नदी शीघ्र ही एक बड़ी नदी ‘श्योक’ में मिल जाती है। अत: इसे श्योक घाटी भी कह सकते हैं। सीमावर्ती गांव तुर्तक, त्यक्शी और थेग श्योक के किनारे बसे है। फिर यह PoK में प्रवेश करती है और आगे Indus (सिन्धु) नदी में मिलती है।
लेह से नुब्रा /श्योक घाटी पहुंचने के लिये 18000 फीट की ऊंचाई पर स्थित खारदोंग-ला से गुजरना पड़ता है। जबकि वेली स्वयं लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर है।
गजब की सुन्दरता। हसीन लोग। दिल जीतने वाले। वादी में नदी का चौड़ा पाट। खूब सारी रेत। पतली सी धारा। पास जाओ तो अच्छा खास पानी। शुभ्र नीला। तेज गति से बहता हुआ। चारों ओर ऊंचे ऊंचे सूखे पहाड़। वृक्षहीन। हरियाली केवल नदी किनारे। बीच बीच में गांव। खुबानी (Apricot) और अन्य फलों के Orchards (फल बाग)।
टेक्सी से हमारा सामान उतारा जा रहा था। हमें दिखाया गया कि आपकी होटल वहां ऊपर है। पैदल चढ़ना होगा। हम थक गये। शायद 60 फीट होगा। सांस फूल गई। बार बार रुकना पड़ा। हमारे पहुंचते पहुंचते, ये लो, हमारा सामान रस्सियों से बांध कर पीठ पर लादे दो अधेड़ महिलाएं फटाफट चढ़ी आ रही हैं।
गांव की संकरी गलियों में घूमने में खूब आनन्द आया। और आता भी क्यों न? यहां के गौर वर्ण, सुन्दर नाक नक्श और दहके दहके से अनार जैसे गालों वाले स्त्री-पुरुषों के Idyllic जीवन को कुछ समय के लिये कुछ समीप से देख कर मन तृप्त हुआ।
पूरी आबादी मुस्लिम है। तीन सम्प्रदाय है। अहले अदीस, अहले सुन्नत अल जमात और नूरबख्शिया। दो मस्जिदें है। नूरबख्शियां वालों की अलग।
सभी पूर्ण सौहार्द्र और भाइजारे के साथ रहते हैं। भारत के प्रति उपक्रत और बफादार है। पाकिस्तान को लानत मलामत भेजते हैं।
एप्रिकाट (खुबानी) के हरे कच्चे फल भी चखने में ठीक ठीक लगे। जुलाई में पक जायेंगे। खूब आमद और व्यापार होते हैं।
मकान मूलरूप से पत्थरों और लकड़ियों के बने थे। सीमेन्ट नहीं, मिट्टी की जुड़ाई की जाती है। गलियों को दोनों और बाल्टी स्थापत्य शैली के घरों, दरवाजों, खिड़कियों, काम करती महिलाओं और खेलते बच्चों को देख कर मन हो रहा था कि मेरा कैमरा चलता ही रहे और मेरे स्टिल तथा वीडियो दोनों तरह का मेरा खजाना समृद्ध होता रहे। लेकिन बिना अनुमति के ऐसा करना उचित न होता।
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बौद्ध मोनास्ट्री
मोनास्टरी शब्द के अनेक पर्यायवाची हैं — मठ, आश्रम, विहार, संघ।
सभी धर्मों में होते हैं।
लद्दाख में हमने कुछ बौद्ध मठ देखे। और भी प्रान्तों तथा देशों में देखे हैं।
अच्छा अनुभव होता है। ऊंचे पहाड़ पर सुन्दर लोकेशन। चढ़ने में थकान आती है। दूर से बहुत भव्य दिखती है। Monasteries Seem to precariously hinged on high cliffs.
सुनसान सुदूर दुर्गम इलाकों में सहसा रंगीन कलात्मक विशाल भवनों का संकुल देख कर मन में मानव जीवटता के प्रति सम्मान और आश्चर्य की भावनाएं उठती हैं।
शिखर पर पहुंच कर नयनाभिराम विहंगम परिदृश्य देखने को मिलते हैं।
हिन्दु मन्दिरों से समानताएं मिलती है। ध्वजाएं, झण्डिया, छोटे बड़े दीप और दीप स्तम्भ, जूते बाहर निकालना, मंत्रोच्चारण, मूर्तियां या मूतियां, उन्हें प्रणाम करना या दण्डवत होना।
हिन्दु मन्दिरों की तुलना में बहुत साफ, व्यवस्थित।
चटख रंगों का उपयोग अधिक होता है। लाल, केशरिया, हरा, नीला।
ढेर सारे देवताओं और संतो के नाम संस्कृत शब्दों में पढ़ता रहा।
मन में खुशी और संतोष था।
लद्दाख की मोनास्टरी में तिब्बतीय प्रभाव बहुत अधिक है। काष्ठशिल्प (लकड़ी पर नक्काशी) बहुत बारीक है। एक से बढ़ कर एक पेंटिंग्स (भित्तिचित्र) या (FRESCO) रहते हैं।
प्रत्येक मठ में एक संघ-कक्ष (Assembly Hall) (दुखांग) होता है जहां लामा गण और पुजारी प्रार्थनाएं और दूसरे कर्मकाण्ड करते है। दर्शकों का स्वागत है। शान्त रहो। चुपचाप देखते रहो। सुनते रहो।भाषा नहीं मालुम। ध्वनियों का सकारात्मक प्रभाव महसूस होता। ड्रम/ताशा और झांझर बजते हैं। पोथियां पढ़ी जाती है। बौद्ध धर्म की अनेक शाखाओं, उपशाखाओं, महापुरुषों, देवताओं, देविओं का इतिहास लम्बा पुराना और जटिल है। मैने उसके कुछ विस्तार में जाने की कोशिश की लेकिन जल्दी ही थक गया और बोर हो गया।
कुछ मठों में Museum या संग्रहालय भी होते हैं जहां अनेक प्राचीन वस्तुएं, चित्र और पाण्डुलिपियां सहेज कर रखी जाती है।
हिन्दु तीर्थों में पण्डों की दादागिरी और धन्धेबाजी जैसा माहौल कही नहीं देखा।
सभी मोनास्टरी में बौद्ध पंचांग की खास तिथियों पर वार्षिक समारोह होते हैं, मेले लगते हैं, मुखौटे पहन कर नृत्य होते हैं, बड़े अनुष्ठान होते है।
यहां कुछ आकृतियों को परिभाषित करना चाहुंगा।
गोम्पा या गोन्पा या चोर्तेन
तिब्बती भाषा में गोम्पा का अर्थ है मन्दिर या मठ। जहां Meditation या ध्यान साधना करी जाती है। इन मठों में लामा रहते है। वयस्क और बच्चे (शिष्य या बटुक)। पाठशालाएं चलती है। अध्ययन, मनन, चर्चा तथा शास्त्रार्थ होते है।
स्तूप को तिब्बती भाषा में चोर्तेन कहते है। ये स्मारक छोटे से ले कर बहुत बड़े हो सकते है। छोटे वाले राह चलते बार बार दिखते है। कई बार सुनसान घाटियों, मैदानों पगडंडीयों, पहाड़ों में मिलते है कारगिल से लेह की दिशा में बढ़ते समय मस्जिदों की मीनारों के स्थान पर चोर्तेन के गुम्बज दिखाई पड़ने लगें तो समझ लो कि बौद्ध बहुल इलाके में प्रवेश कर गये हैं।
इन रचनाओं में या तो भगवान बुद्ध के (जैसे कि सांची और सारनाथ) के अन्य महापुरुषों के अस्थि अवशेष व अन्य वस्तुएं रखी जाती है। स्तूप प्रतीकात्मक रूप से बुद्ध के ज्ञान और दर्शन को बताते हैं।
इनकी परिक्रमा की खास दिशा और विधि होती है। ठीक वैसे ही जैसे कि हिन्दु मन्दिरों में।
पूर्वी एशिया में (जापान, चीन, कोरिया, वियतनाम आदि) इन्हीं स्तूपों ने ‘पेगोडा’ का रूप धारण कर लिया है।
चोर्तेन का स्थापत्य बौद्ध मान्यताओं और दर्शन को प्रतिबिम्बित करता है।
लेह नगर की बाहरी सीमा पर शान्ति स्तूप भव्य और सुन्दर था। पूरा शहर वहां से दिखता था। एक के ऊपर एक दो परिधियां पथ थे। बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित चार murals थे। जन्म, ज्ञान प्राप्ति, असुर संहार और परिनिर्वाण।
हिन्दू और बौद्ध धर्म
दोनों के रिश्ते सदैव अच्छे रहे। हालांकि विरोध और प्रतिस्पर्धा का पुट भी था जिसे वामपंथी स्कालर बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं।
किसी भी हिन्दू को बौद्ध मंदिरों और भगवानों की मूर्तियों के सम्मुख हाथ जोड़ने, नतमस्तक होने में कभी समस्या नहीं रही।
भारत में बौद्ध धर्म की अवनति के अनेक कारण रहे होंगे लेकिन हिन्दू राजाओं द्वारा दबाव या हिंसा कम ही हुए। अधिकांश राजा, बौद्ध या हिन्दू, दोनों प्रकार के धर्मस्थलों को प्रश्रय देते थे। शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ द्वारा बौद्ध धर्म को पराजित किया। भीमराव अंबेडकर लिखते हैं कि बौद्धों के पतन के पीछे मुस्लिम आक्रमण प्रमुख कारण था।
Here is a link to an article by Koenraad Elst:
“ Buddha was every inch a Hindu,”
https://bharatabharati.in/2013/08/10/buddha-was-every-inch-a-hindu-koenraad-elst/