Dr Apoorva Pauranik

MahaKumbh Prayagraj

प्रयागराज महाकुम्भ में एक अनीश्वर वादी कुम्भ का शब्द संचय न्यूरोलॉजी में मस्तिष्क की बौद्धिक क्षमताओं का आकलन करने हेतु एक परीक्षण होता है

प्रयागराज महाकुम्भ में एक अनीश्वर वादी कुम्भ का शब्द संचय न्यूरोलॉजी में मस्तिष्क की बौद्धिक क्षमताओं का आकलन करने हेतु एक परीक्षण होता है —[Word Association] [शब्द सम्बन्ध] व्यक्ति को कोई एक शब्द देते हैं और कहते हैं इस शब्द को सुनकर अगले दो मिनिट में आप के दिमाग में जो जो अन्य शब्द आते हैं, उन्हें बोलते जाइये। डॉ आलिवर सेक्स को मैंने शब्द दिया था ‘India’ तथा उनके उत्तर थे: “ चाय, आपके रुपये के बारे में क्या ख्याल है, माउंट बैटन, द इंडियन म्यूटिनी, राज, संस्कृत..., अभी, अब, मुसीबत..., प्राचीन सभ्यता, मेरे अच्छे सहयोगी रामचन्द्रन, प्रसिद्ध गणितज्ञ रामानुजम, गांधी, टैगोर।” पिछले कुछ दिनों से मैं अपने आप से पूछता जा रहा हूँ कि [प्रयागराज-महाकुम्भ] इस शब्द युग्म का स्मरण करके मेरे मन पटल पर कौन कौन से शब्द प्रगट होते है। इनका क्रम उल्टा पुल्टा गड्ड मड्ड रहा है। हालांकि मैंने प्रयत्न करके उन्हें कुछ समूहों में बांट दिया है। > *भीड़, लोग, लोक, जन-समूह, जनसागर > *भव्य, सुन्दर, आभायुक्त विशाल, बड़ा, जंगी, अंतहीन > *जगमश, प्रकाशित, रोशनियां > *व्यवस्था, योजना, कार्यान्वयन > *परमार्थ, सौहार्द्र, सहयोग, मुस्कान > *संस्कृति, सभ्यता, संस्कार, सरलता, भोलापन > *विविधता, चेहरे मोहरे, पहनावा, गरीब, मध्यवर्ग, अमीर, युवा, वृद्ध > *भाषा, प्रान्त, रंग, जाति > *चरैवैति चरैवैती, चलते रहो, अनथक > *आस्था, श्रध्दा, विश्वास, धर्म > *हम सब एक है। > *हम सब हिन्दू है। > *हम सब भारतीय है। प्रयागराज महाकुम्भ में एक अनीश्वर वादी घुमन्तुओं द्वारा आतिध्य प्रयागराज में प्रवेश करते हुए ट्रेफिक रेंग रहा था। हमें टेक्सी बदलना थी। सैकड़ों वर्ग मीटर क्षेत्रों में फैले हुए जगमगाते पार्किग मैदानों में हज़ारों बसें व अन्य वाहन खड़े थे। बेला कछार नामक इस इलाके में हम दूसरी टेक्सी की प्रतीक्षा कर रहे थे। सहसा ध्यान गया कि एक बड़ी बस के पीछे लगभग 40 स्त्री पुरुषों का समूह जमीन पर बैठा था। लुगाइयों के लाल लुगड़े बस के पीछे ब्रेक के लाल प्रकाश में और भी अधिक लालिमा से सराबोर थे। स्त्रियों के सिर ढंके थे पर घुंघट नहीं। गैस के चूल्हे पर फटाफट रोटियां सिंक रही थी। भोजन बन रहा था। एक पुरुष हमसे खूब बातें करने लगा। बाड़मेर जिला, राजस्थान के रहने वाले थे। एक युवती (आधुनिक वेशभूषा में) जोधपुर AIIMS में कार्यरत थी। नीरजा और उसमें खूब बातें हुई। बड़ा संयुक्त परिवार। स्लीपर बस में ही सोता। कहीं धर्मशाला में नहीं ठहराना। जहां भोजन का समय होने वाल हो, ठहर जाना। चार दिन में ये लोग मधुरा-वृन्दावन-प्रयागराज संगम, अयोध्या और काशीविश्वनाथ दर्शन करके घर लौट जाएगे। गैस टंकिया, आटा, दाल, चावल, सब्जियां, नौन-तेल सारी रसद साथ में रखते। बाहर कहीं खाना नहीं। दूध खरीद लेना। एक स्त्री अगरबत्ती जलाकर संध्यावंदन कर रही थी। युवती ने हम दोनों के लिये ताबड़तोड़ चूरमा बनाया (रोटी गुड़ और घी)। गरमागरम चाय पिलवाई। पीछे क्षितिज पर फाल्गुन कृष्णपक्ष तृतीया का चन्द्रमा उग आया था हवा में खुशनु‌मा ठंडक थी। भारतीय सौहार्द की सुखद अनुभूतियां थी। प्रयागराज प्रवास ऐसे ही आत्मीय प्रसंगों से भरा था। *प्रयागराज महाकुम्भ में एक अनीश्वर वादी एक माँ के आशीर्वाद अम्माजी को व्हीलचेयर पर उनका बेटा चलाये ले जा रहा था। राजस्थान के सीकर जिले से आये थी। व्हीलचेयर साथ लाये थे। रेल, बस आदि सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करते थे। कितना थका देने वाला श्रम होता होगा। लेकिन माता पुत्र के चेहरे क्लान्त नहीं थे। हमने रोका और प्रणाम किया। पूछा उनके बारे में। बताया अपने बारे में। दोनों गदगद हो गये। > माताजी बोली “तुम दोनो अपने से लग रहे हो”। > फिर कुछ संकोच से पूछा — “क्या तुम दोनों ___ वह ___ क्या ____ हो”? > हम समझ गये। बताया हम पति-पली है। माता जी के चेहरे पर वात्सल्य खिल उठा। > हम दोनों के सिर पर हाथ फेरा और आशीर्वाद दिया > “लक्ष्मी और नारायण की जोड़ी जुग-जुग बनी रहे”। हम दोनों को अपनी भारतीय संस्कृति पर गर्व हो रहा था। प्रयागराज महाकुम्भ में एक अनीश्वर वादी (B) कुम्भ में एक बटुक से परिचय लव कुश मिश्रा, 14 वर्ष, (पूर्वांचली) अपने स्वामी के आश्रम के व्यवस्थापकों में से एक है। उसने हमारी छोटी मोटी जरूरतें पूरी करने में मदद करी। सौम्य, मृदुभाषी, स्मित चेहरा। गेरुए वस्त्र। किशोरवय। गाँठ लगी हुई बड़ी से चोटी। उसके जैसे 4-5 बटुक और थे। मेरे मन में कौतुहल था उनके बारे में जानने का। कुछ देर चर्चा यूं चली। > अपूर्व: तुम्हारी पढ़ाई क्या होती है। > लवकुश: मैं प्रथमा का छात्र हूँ। > (फिर मुझे समझाने की दृष्टि से कहा) — जो कि नवमी के बराबर समझ लो। > अपूर्व: पाठशाला के बारे में बताओं? > लवकुश: अयोध्या में रामलला मन्दिर के समीप गुरुजी के आश्रम में रहते हैं, सेवा करते है, पढ़‌ते है। > अपूर्व: कौन कौन से विषय? > लवकुश: संस्कृत, हिन्दी, थोड़ी सी काम चलाऊ अंग्रेजी। थोड़ा सा अंक गणित। मुख्य विषय है- वेद, उपनिषद, अन्य धर्म ग्रन्थ, ज्योतिष, कर्म काण्ड, पूजा विधियां, संस्कार विधियां > अपूर्व: विज्ञान, इतिहास, भूगोल, सामाजिक अध्ययन? > लवकुश: नहीं। गुरुजी कहते हैं सांसारिक विषयों की आवश्यकता नही है। गुरुजी के अनुसार विज्ञान मनुष्य को तक्नालाजी का गुलाम बना देता है। > अपूर्व: तो फिर तुम यह मोबाइल फोन क्यों रख रहे हो? > लवकुश: (मुस्कुरा भर दिया।) मैं सोचता रहा कि Religions में ऐसा क्या आकर्षण है कि कच्ची उम्र में बालक-बालिकाएं, किशोर-किशोरियां, कभी उनके माता पिता के समर्थन से या कभी उनके विरोध के वावजू‌द इस कठिन राह को चुनते है। जैन महाराज साहब (स्त्री या पुरुष दोनों के लिये यह उभयलिंगी शब्द है), ईसाई Monks और Nuns, मुस्लिम इमाम, काजी, बौद्ध, भिक्षु सभी इसी परम्परा के अंश है। मैं इस विषय में कोई Value Judgment नहीं देना चाहता। मैं हैरान होता हूँ। समझने की कोशीश करता हूँ।

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