Dr Aniruddha Vyas

Bhutan

भूटान की यात्रा दूसरी यात्राओं से भिन्न रही। सम्भवतः ये मेरी पहली यात्रा है जिसमें मुझे खुला सुंदर आसमान पहाड़ जंगल नदी फूल वन्य जीव पक्षियों ने कम अपितु मानव सभ्यता ने ज़्यादा कौतूहल और विस्मय में डाला। इसका ये बिल्कुल भी मतलब नहीं की इन सब की सुंदरता इस हिमालयी राज्य में यहाँ बसे इंसानों से कुछ भी कमतर है। भौगौलिक सरंचना, बौद्धमठ व्यवस्था, राजतंत्र और लोकतंत्र के अनूठे मेल से उत्पन्न इस सुंदर इन्द्रधनुषीय रंगोली में एक सप्ताह व्यतीत कर यहाँ आकर भी अनायास ही ध्यान इस भूटान की शांत अप्रतिम वादियों में या कहीं भूटानी लोगों की मुस्कुराहटों में या फिर बिना ट्रैफिक सिग्नल की सड़को में भी व्यवस्थित शांत सी वाहनचाल में खो रहा है।

हमने इस सीमित यात्रा कार्यक्रम (Iternary) दो दिन थिम्पू, फोबजिखा, पुनखा और पारो में बिताए। मन तो हा वैली और बुमथांग का भी था पर समय सीमा के चलते इसे अगली किसी बार के लिए छोड़ दिया। बौद्धधर्म का दर्शन, धारणा और समझ जो एक मेरी तरह सामान्य हिंदू भारतीय को है उससे कुछ अलग रंग में रंगा हुआ, बोधगया कुशीनगर नालंदा से निकल तिब्बत के पठारों में ढलता हुआ और लंबी यात्रा कर, संस्कृत तिब्बती फिर भूटानी में अनुवादित हुआ, लोक कथाओं, देवीय प्रभावों से सजता हुआ ये रंगीला, नाचता, उत्सव मनाता ये थोड़ा उग्र सा बौद्धधर्म बड़ा रोचक लगा पारो का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विश्व के सबसे जोखिम भरे हवाई अड्डों में है, मात्र ११ पायलट ही लाइसेंस धारी हैं इस पर जहाज उतारने की महारत हासिल किए हुए। ये एक तथ्य है जो हम सभी को पता ही है, पर ये पीड़ादायी तब मालूम पड़ा जब आख़िरी दिन ख़राब मौसम की वजह से काठमांडू से आने वाले जहाज़ के तीन लैंडिंग प्रयास फेल हुए और हमारी दिल्ली जाने वाली उड़ान रद्द हुई। हालांकि druk air ने क्षतिपूर्तिवत् हमें एक सुंदर रिसोर्ट में ठहराया और सुबह का नज़ारों को अनमने मन से अपने कैमरे में क़ैद हुए छायाचित्रों में आज देख रहा हूँ तो लगता है कि शायद ये दिन बाक़ी सारे दिनों से ज़्यादा सुंदर था, वो पहाड़ जो पिछले एक हफ़्ते हरे जंगलों से आच्छादित थे “ख़राब” मौसम के दौरान बर्फबारी से सफ़ेद चादर ओढ़े इठला रहे थे। आज ये सुंदर प्रतीत हो रहे हैं, पर उस दिन कुछ ख़ास नहीं थे। बुद्ध के सूत्रों का इससे स्पष्ट अनुभव कि सारे अनुभव अच्छे या बुरे मनःस्थिति पर ही निर्भर है, मन ही हमारे इन्द्रियविषयों को सुंदर या ख़राब रंग देता है, विषय तो वही रहते हैं, इन्द्रियाँ भी वही है, मन ही इनमें रंग भर हमें desire pleasure या suffering का एहसास दिलाता है। और हाँ!फिर जैसे क्षणभंगुरता (impermanence) ही इस संसार का नियम है, वैसे ही “ख़राब” मौसम भी बदला और हम वापस अपने ठिकाने लौट आये। भूटानी लोग सीधे सरल सहज और स्वागतातुर हैं। इनका ख्याल तीन व्यवस्थाएं रखती हैं, राजा, निर्वाचित नेता और बौद्धमठ। ये तीनो व्यवस्थाएं आपसी तालमेल में हैं, एक दूसरे की टाँग खींचते नहीं लगते। आमलोग इन तीनो से संतुष्ट हैं, विशेष रूप से राजा से इनका प्रेम और लगाव अटल है। अपनी दुकानों, संस्थानों, होटलों, घरों में ये लोग राज परिवार के सुंदर छाया चित्र धर्मगुरु (पद्मसंभव गुरु रिंपोचे) के समकक्ष लगते हैं। शारीरिक रूप से स्वस्थ, परिश्रमी, और सेहतमंद भोजन खाते हैं। इनकी घरेलू नुस्खे से तैयार चावल से बनी मदिरा “आरा” लाजवाब है। ये लोग छोटी छोटी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढना जानते हैं। इन्हें विकसित विश्व से कुछ सीखने की ज़रूरत नहीं लगती। इन्हें विश्व की किसी होड़ में नहीं लगना। इन्हें सैन्यशक्ति, अस्त्रशत्रशक्ति, परमाणु बमो से कोई मतलब नहीं है। GDP पे विश्वास नहीं है, ये GNH (gross national happiness) को मानते हैं। बौद्धधर्म के नैतिक (moral) (ethical) आचरण (conduct) को अपने जीवन में आत्मसात किए हुए हैं। अपने भूटान प्रवास में किसी पहाड़ पे homestay का विचार ज़रूर रखें, हमें बड़ा आनंद आया पुनखा में इस homestay के दौरान।

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