Prashant Chitnis

Mandu (Mandavgad)

विदा 2025, स्वागत 2026: मांडवगढ़ की यादगार यात्रा “इतिहास, हास्य और उल्लास का संगम” 31 दिसंबर 2025 की सुबह 8 बजे, इंदौर बैंक के 33 साथियों का समूह नववर्ष 2026 के स्वागत के लिए ऐतिहासिक मांडवगढ़ की ओर निकला। तीन वर्ष के नन्हे यात्री से लेकर 78 वर्ष के अनुभवी साथी तक—यह यात्रा पीढ़ियों का सुंदर संगम थी। दो 25-सीटर वाहनों में सवार यह दल उत्साह और उमंग से भरा था।

प्रथम पड़ाव: प्रकृति की गोद में मानपुर में नाश्ते के बाद हम पहुँचे कांकड़ खो (मेहंदीखेड़ी)—एक छिपा हुआ प्राकृतिक रत्न। घाटियों, हरियाली और चट्टानों के बीच बहता बरसाती झरना मनमोहक था। ताज़ा जामफल ने हमारा स्वागत किया। ड्रोन फोटोग्राफी और प्रकृति के बीच बिताए पल अविस्मरणीय रहे। डायनो पार्क में 70-100 मिलियन वर्ष पुराने डायनासोर अंडों और जीवाश्मों ने सबको चकित कर दिया। यह जानना रोमांचक था कि धार क्षेत्र कभी समुद्र था, जो बाद में डायनासोरों का निवास बना। यह वैज्ञानिक और शैक्षिक अनुभव बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी के लिए ज्ञानवर्धक रहा। मांडवगढ़ का ऐतिहासिक वैभव दोपहर में स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन का आनंद लिया। शाम को जामा मस्जिद की यात्रा से ऐतिहासिक भ्रमण शुरू हुआ। जामा मस्जिद: इस्लामी स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना 15वीं शताब्दी में सुल्तान होशंग शाह द्वारा निर्मित और महमूद खिलजी द्वारा पूर्ण कराई गई यह मस्जिद दमिश्क की मस्जिदों से प्रेरित है। 140 स्तंभों पर टिकी इसकी छत और विशाल प्रांगण मालवा सल्तनत की शक्ति का प्रतीक है। होशंग शाह का मकबरा: भारत का प्रथम संगमरमर मकबरा यह अद्भुत स्मारक ताजमहल की प्रेरणा माना जाता है। गुजरात और राजस्थान से मंगवाए गए संगमरमर से निर्मित यह मकबरा सममित वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। अशर्फी महल: ज्ञान का केंद्र 15वीं शताब्दी में महमूद खिलजी द्वारा निर्मित यह इस्लामी मदरसा कुरान, हदीस, दर्शन और खगोलशास्त्र की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। लाइट एंड साउंड शो: इतिहास जीवंत हुआ हिंडोला महल में आशुतोष राणा की दमदार आवाज़ में मांडव का इतिहास जीवंत हो उठा। परमार काल से लेकर रानी रूपमती-बाज़ बहादुर की प्रेम कथा तक—संगीत, प्रकाश और कथा का अद्भुत संगम था। अंधेरे में जगमगाती दीवारें और गूंजती आवाज़—"मैं मांडव हूँ... मैंने वैभव भी देखा, प्रेम भी, और एक दिन मौन भी..."—यह अनुभूति अविस्मरणीय रही। रात्रि भोज के बाद साथी श्री सुरेश व्यास ने अपनी पुस्तक "मेरी कहानी - मेरा सफर" की एक-एक प्रति सब को भेंट की। तत्पश्चात श्री दिनेश अग्रवाल जी के संचालन में तंबोला और श्री बी.एल. पानेरी जी द्वारा अपने चुटीले अंदाज में सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी में खूब हँसी-मज़ाक हुआ। ठीक मध्यरात्रि को हमने 2026 का हर्षोल्लास से स्वागत किया। 1 जनवरी 2026: नए वर्ष का सूर्योदय नववर्ष की सुबह चाय और नाश्ते से शुरू हुई। इंदौर के सेव पोहे, गुजराती उपमा और मूंग के उसल का पौष्टिक नाश्ता अत्यंत स्वादिष्ट था। रानी रूपमती का महल: प्रेम और बलिदान की गाथा मांडव की सर्वोच्च पहाड़ी पर स्थित यह महल रानी रूपमती और बाज़ बहादुर की अमर प्रेम कहानी का साक्षी है। नर्मदा नदी की भक्त रूपमती के लिए बाज़ बहादुर ने यह महल इस प्रकार बनवाया कि यहाँ से नर्मदा के दर्शन हो सकें। 1561 में मुगल आक्रमण के समय रूपमती ने अपमान से बचने के लिए विषपान कर प्राण त्याग दिए—यह नारी स्वाभिमान का सर्वोच्च उदाहरण है। बाज़ बहादुर का महल: संगीत और स्थापत्य का संगम 16वीं शताब्दी में निर्मित यह महल मालवा के अंतिम स्वतंत्र शासक बाज़ बहादुर की संगीत-प्रियता को दर्शाता है। मोटी दीवारों में पानी प्रवाहित कर इसे ठंडा रखने की व्यवस्था उस युग की उन्नत इंजीनियरिंग का प्रमाण है। यहाँ हमारे संगीत-प्रेमी साथियों ने पुराने फिल्मी गीत गाए—ऐसा लगा जैसे रूपमती और बाज़ बहादुर स्वयं सुन रहे हों। जहाज़ महल: जल पर तैरता इतिहास मुंज तालाब और कपूर तालाब के बीच स्थित यह महल दूर से देखने पर तैरते जहाज़ जैसा प्रतीत होता है। 15वीं शताब्दी में सुल्तान ग़यासुद्दीन खिलजी ने इसे हरम महल के रूप में निर्मित कराया था। जल संरक्षण, प्राकृतिक वेंटिलेशन और शीतलता की व्यवस्था—यह उस युग का नेचुरल एयर कंडीशनर था। हिंडोला महल: झूलती दीवारों का रहस्य होशंग शाह द्वारा निर्मित यह महल अपनी बाहर की ओर झुकी दीवारों के लिए प्रसिद्ध है। यह झुकाव संरचनात्मक मजबूती के लिए था। बिना खंभों का विशाल हॉल और उत्कृष्ट ध्वनि व्यवस्था इसे शासकीय सभाओं के लिए आदर्श बनाती थी। स्वादिष्ट भोजन और मस्ती दाल-बाफले, कढ़ी, गट्टे की सब्जी और चूरमा का भोजन इतना स्वादिष्ट था कि सब इतिहास भूल गए। भरपेट भोजन के बाद धार के किले को दूर से प्रणाम कर, चाय ब्रेक के साथ हम शाम 6 बजे तक सुरक्षित इंदौर पहुँच गए। आभार और धन्यवाद इस अविस्मरणीय यात्रा की सफलता आयोजकों की कुशल व्यवस्था और सबसे बढ़कर, इस सभी 33 साथियों और उनके परिजनों को जाता है, जिन्होंने एक ‘एक्सटेंडेड फैमिली’ की तरह स्नेह, सहयोग और उत्साह के साथ इस यात्रा को यादगार बनाया। पुरानी यादों को संजोते हुए और नए संकल्पों के साथ हमने 2025 को विदाई दी और 2026 का भव्य स्वागत किया। यह स्मृतियाँ लंबे समय तक हमें मुस्कुराने पर मजबूर करती रहेंगी। आप सभी साथियों का हृदय से आभार एवं धन्यवाद! "यात्रा सिर्फ स्थानों की नहीं, दिलों की भी होती है—और यह यात्रा हमारे दिलों में सदा बसी रहेगी।"

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